*मनोभाव* तुम पर गुस्सा होना, अभिनय भर ही है मेरा। और तुम सिहर जाती हो, मेरे इस अभिनय से। तुम्हारे करुण नेत्र, छू जाते हैं,आत्मा के; न जाने कौनसे अंश को। कि वश में नहीं रह पाता मैं। करुणार्द्र हो आ गिरता हू। हकीकत के धरातल पर। अभिनय से। तुमसे नाराज़ होना, अभिनय भर ही है मेरा।