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मणिमहेश कैलास चंबा

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मणिमहेश यात्रा (भाग 3) दिनांक:- 15/09/2018  नैनी खड्ड से आगे बढ़ने पर ऊँचाई बढ़ती जाती है व पर्वतों के ढलानों पर चीड़ व देवदार के वृक्षों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है।रास्ते में एक जगह लेंडस्लाइड़ वाला वह स्थान भी मिलता है जो कुछ दिन पूर्व टी.वी न्यूज में दिखाया जा रहा था।जहाँ हम लोगों के लिये लैंडस्लाईड भय का विषय है वहीं दूसरी ओर यह पहाडी लोगों की दैनिक जीवनचर्या में सम्मिलित है।बस में अधिकांश मणिमहेश जाने वाले यात्री ही बैठे थे।इनमें से कुछ पूर्व में यह यात्रा कर चुके हैं,वो अपने अनुभव साझा कर रहे थे।लगभग घंटे भर के बाद बस "बनिखेत" पहुंचती है।डलहौजी में पर्यटक अतिभारण के कारण बनिखेत में होटल उद्योग ने विशाल रूप ले लिया है।बनिखेत से दाँयी तरफ डलहौजी के लिये रास्ता गया है जो खज्जियार होते हुए चंबा को भी निकल जाता है।खज्जियार से एक रास्ता "चुवाडी" के लिये भी निकलता है,जिससे धर्मशाला जाया जा सकता है।  हमारी बस डलहौजी मोड़ पर सवारी उतारने व सवारी लेने के लिये रुकती है।हमारी बस से पहली वाली बस के ब्रेकडाउन होने के कारण यहाँ बहुत लोग खड़े मिलते हैं ज...

मणिमहेश कैलास यात्रा

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 *मणिमहेश* :-प्रकृति की गोद में (भाग2) दिनांक 15/09/2018 सुबह जल्द ही नींद खुल गयी,वैसे भी घर के अतिरिक्त अन्य स्थान पर मुझे गहरी नींद आती भी नहीं है।अतुल भाई साब अल-सुबह ही बोगी के शौचालयों का निरीक्षण कर आये थे,जोकि अन्दर घुसने लायक स्थिति में भी नहीं थे।   हम भारतीय अत्यल्प सुविधाओं में बसर करने के अभ्यस्त होते हैं। ये भी कहा जा सकता है कि हमें सरकारी सुविधाओं को अविवेकपूर्ण दोहन द्वारा अत्यल्प सुविधाओं में परिवर्तित करने में महारत हासिल है। खैर पठानकोट पहुंच कर ही शौचादि से निवृत होने का विचार किया।सुबह जागने पर हम पंजाब में थे।पंजाब कृषि की दृष्टि से भारत का प्रमुख प्रांत है।यहाँ खरीफ में धान की फसल प्रमुखता से बोई जाती है।पठानकोट तक सतलुज, व्यास व चक्की नदी को पार करना पड़ता है। साथ वाली बर्थों पर बैठे खंडवा(म.प्र) के किसी गाँव के कुछ परिवार वैष्णोदेवी यात्रा के लिये जा रहे थे।अगर सहयात्रियों से वार्तालाप प्रारंभ करना हो तो वर्तमान राजनीति पर थोड़ी चर्चा प्रारंभ कर दीजिये;शीघ्र ही उनके अन्दर का सुकरात,लेनिन या कार्ल मार्क्स आदि बाहर निकल आता है।आपको उनके विचारों से ...
    *मणिमहेश कैलास* :- प्रकृति की गोद में (भाग1)    मानव प्रजाति का उद्विकास एक यायावर प्रजाति के रूप में ही हुआ था।ये भी कहा जा सकता है कि घुमक्कड़ी मनुष्य के 'जीन्स' से सम्बद्ध है।वर्तमान में आयोजित विभिन्न यात्राओं को मनुष्य की यायावर प्रवृत्ति का अवशेषी प्रमाण कहा जा सकता है। मुझे यू तो बचपन से ही नयी जगह भाती रहीं हैं किंतु किशोरावस्था से नूतन स्थानों के भ्रमण के प्रति विशेष रुचि उत्पन्न हुई। बहुत समय पश्चात 14/09/2018 को हिमांचल की सुरम्य वादियों के भ्रमण का सुअवसर प्राप्त हुआ।हालाँकि इस यात्रा का प्रोग्राम 2017 में भी बना था किंतु किन्ही कारणवश यह प्रोग्राम रद्द करना पड़ा।इस यात्रा के लिये मेंने पत्नी के भाई(वर्तमान में साला शब्द अशिष्ट माना जाने लगा है😉) से वार्तालाप किया तो वे सहज ही साथ चलने को तैयार हो गये। 14/9/18 का झेलम ऐक्सप्रेस से मथुरा से पठानकोट आरक्षण करा लिया व 18/9/18 को झेलम से ही वापसी का आरक्षण करवा लिया। नियत तिथि14/9/18 शुक्रवार को 2 बजे अपने कार्यस्थल से सोमवा मंगलवार 2 दिवस की सी.ऐल स्वीकृत करा रवाना हुआ शनिवार रविवार व बुधवार का अव...