*मनोभाव*
तुम पर गुस्सा होना,
अभिनय भर ही है मेरा।
और तुम सिहर जाती हो,
मेरे इस अभिनय से।
तुम्हारे करुण नेत्र,
छू जाते हैं,आत्मा के;
न जाने कौनसे अंश को।
कि वश में नहीं रह पाता मैं।
करुणार्द्र हो आ गिरता हू।
हकीकत के धरातल पर।
अभिनय से।
तुमसे नाराज़ होना,
अभिनय भर ही है मेरा।

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