*मणिमहेश कैलास* :- प्रकृति की गोद में (भाग1)
   मानव प्रजाति का उद्विकास एक यायावर प्रजाति के रूप में ही हुआ था।ये भी कहा जा सकता है कि घुमक्कड़ी मनुष्य के 'जीन्स' से सम्बद्ध है।वर्तमान में आयोजित विभिन्न यात्राओं को मनुष्य की यायावर प्रवृत्ति का अवशेषी प्रमाण कहा जा सकता है।
मुझे यू तो बचपन से ही नयी जगह भाती रहीं हैं किंतु किशोरावस्था से नूतन स्थानों के भ्रमण के प्रति विशेष रुचि उत्पन्न हुई।
बहुत समय पश्चात 14/09/2018 को हिमांचल की सुरम्य वादियों के भ्रमण का सुअवसर प्राप्त हुआ।हालाँकि इस यात्रा का प्रोग्राम 2017 में भी बना था किंतु किन्ही कारणवश यह प्रोग्राम रद्द करना पड़ा।इस यात्रा के लिये मेंने पत्नी के भाई(वर्तमान में साला शब्द अशिष्ट माना जाने लगा है😉) से वार्तालाप किया तो वे सहज ही साथ चलने को तैयार हो गये।
14/9/18 का झेलम ऐक्सप्रेस से मथुरा से पठानकोट आरक्षण करा लिया व 18/9/18 को झेलम से ही वापसी का आरक्षण करवा लिया।
नियत तिथि14/9/18 शुक्रवार को 2 बजे अपने कार्यस्थल से सोमवा मंगलवार 2 दिवस की सी.ऐल स्वीकृत करा रवाना हुआ शनिवार रविवार व बुधवार का अवकाश था ही।
शाम को 6 बजे मथुरा से ट्रेन थी सो मैं और मेरे सहयात्री अतुल चौधरी 5 बजे ही मथुरा स्टेशन पहुंच गये।और फिर वही हुआ जो प्रत्येक भारतीय रेलयात्री के साथ होता है; ट्रेन पूरे 2 घंटे लेट थी।खैर 2 घंटे झेलने के बाद झेलम ने अपने दर्शनों से हमें अनुगृहीत किया।हमने ट्रेन के और अधिक लेट ना होने पर ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित किया व मैं अपनी बर्थ पर जाकर पसर गया।वैसे अगर ट्रेन सही समय पर आ जाती तो यात्रा के साथ वो रोमांचक अनुभव ना जुड़ते जिन्हें आप आगे पढोगे।
एक बार अगर लेट हो जाये तो भारतीय रेल और अधिक लेट होती जाती है। मैं तो अपनी बर्थ पर पसर गया था किंतु चौधरी साब की अपर बर्थ पर एक अधेड़ उम्र के महानुभाव खर्राटे भर रहे थे।हमने उन्हें जगाया तो बोले जब भी आप सोने आओ तो मैं हट जाऊंगा।हमें अभी भोजन भी करना था सो उसे ~सोने~ खर्राटे भरने दिया।मेरी सासू माँ ने अपने चिर-परिचित लाड़ का परिचय देते हुए घी के लड्डू,पूड़ी,सब्जी, अचार कई प्रकार के नमकीन बिस्किट बैग में रख भेजे थे।
भोजन करने के पश्चात मैंने "खर्राटा अंकल" से पूछा कहाँ जाओगे?
बोला "दिल्ली"
हमें अभी नींद भी नहीं आ रही थी सो हम साईड़ बर्थ पर गपशप करते रहे।अतुल भाईसाब ठीकठाक गुनगुना लेते हैं सो कर दी फरमाईश कभी मुकेश तो कभी रफी साहब तो कभी किशोर दा,और इतने में दिल्ली आ गयी।
'खर्राटा' का उतरने का कोई उपक्रम ना देख मैं समझ गया कि ये अनुभवी रेलयात्री है और हमें होशियारपुर का समझ रहा है।
मैंने उसे नीचे उतारा और ऊपर बर्थ पर सोने का असफल प्रयास करने लगा उधर चौधरी साब सो भी गये।कुछ देर मोबाईल में उंगली करने के बाद मैं भी सो गया।
क्रमश:...


Comments

  1. इतना सुन्दर यात्रा वृतांत आज तक नहीं पढ़ा।बड़ी उत्सुकता हो रही है आगे और पढ़ने की।कृपया आगे का अनुभव शीघ्र शेयर करें।धन्यवाद

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    1. धन्यवाद।
      शेष भाग शीघ्र ही पब्लिश होगा।
      पुनः आभार।

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