मणिमहेश कैलास यात्रा
*मणिमहेश* :-प्रकृति की गोद में (भाग2)
दिनांक 15/09/2018
सुबह जल्द ही नींद खुल गयी,वैसे भी घर के अतिरिक्त अन्य स्थान पर मुझे गहरी नींद आती भी नहीं है।अतुल भाई साब अल-सुबह ही बोगी के शौचालयों का निरीक्षण कर आये थे,जोकि अन्दर घुसने लायक स्थिति में भी नहीं थे।
हम भारतीय अत्यल्प सुविधाओं में बसर करने के अभ्यस्त होते हैं। ये भी कहा जा सकता है कि हमें सरकारी सुविधाओं को अविवेकपूर्ण दोहन द्वारा अत्यल्प सुविधाओं में परिवर्तित करने में महारत हासिल है। खैर पठानकोट पहुंच कर ही शौचादि से निवृत होने का विचार किया।सुबह जागने पर हम पंजाब में थे।पंजाब कृषि की दृष्टि से भारत का प्रमुख प्रांत है।यहाँ खरीफ में धान की फसल प्रमुखता से बोई जाती है।पठानकोट तक सतलुज, व्यास व चक्की नदी को पार करना पड़ता है।
साथ वाली बर्थों पर बैठे खंडवा(म.प्र) के किसी गाँव के कुछ परिवार वैष्णोदेवी यात्रा के लिये जा रहे थे।अगर सहयात्रियों से वार्तालाप प्रारंभ करना हो तो वर्तमान राजनीति पर थोड़ी चर्चा प्रारंभ कर दीजिये;शीघ्र ही उनके अन्दर का सुकरात,लेनिन या कार्ल मार्क्स आदि बाहर निकल आता है।आपको उनके विचारों से थोड़ी समानता स्थापित करने हेतु हाँ में हाँ भर करनी होती है।ऐसा करने पर सहयात्रियों से आपकी प्रगाढ़ता स्थापित होने से कोई नहीं रोक सकता।
वे लोग शिवराज चौहान के राजकार्य की प्रशंसा करते रहे व अत्यल्प समय में ही मेंने अनमने मन से उनसे कपास,सोयाबीन,प्याज की कृषि का ज्ञान ग्रहण कर लिया।
इस समय जालंधर में घटाऐं छाई हुई थीं।थोड़ी देर में ही बारिश प्रारंभ हो गयी हमारी ट्रेन जालंधर पर रुकी रही व ओमप्रकाश जी की ट्रेन आगे निकल गयी।(ओपी प्रजापत जी नोखा बीकानेर से हैं व हमारा एक घुमक्कड़ी ग्रुप द्वारा परिचय हुआ था, ओपी जी 3 अन्य लोगों के साथ यात्रा पर थे)
दसुया व मुकैरिआन के बीच में कहीं एक दीवार पर छपे डाॅ. बंगाली व हकीम सुलेमानी के विज्ञापन ने मेरी पंजाबियों की मर्दानगी संबंधी धारणा को बदल दिया😉😉।यह भी स्पष्ट हो गया कि डाॅ.बंगाली यूपी राजस्थान तक ही सीमित नहीं है वस्तुतः वह तो एक मल्टीनेशनल ब्रांड है😉😉।
खैर रोते पड़ते 9:45AM तक ट्रेन ने हमें पठानकोट ला पटका।पठानकोट केंट स्टेशन पर शौचालय व नहाने के लिये प्रतीक्षालय में स्थान निर्धारित है किंतु वहाँ प्रायः लाईन देखी जा सकती है।हम स्टेशन से बाहर आये और बस स्टैण्ड के लिये ऑटो में बैठ गये।ओ.पी जी टीम सहित बस स्टैंड पहुंच चुके थे व 10:45 की बस में चंबा के लिये सीट भी बुक करवा ली।हमें अभी नित्यकर्म से निवृत होना था सो मेंने गूगल मैप पर सुलभ काॅम्लैक्स सर्च किया जो बस स्टैण्ड के रास्ते में गाँधी चौक पर स्थित था।हम गाँधी चौक उतर कर नित्यकर्म से फारिग हुए इतने में 10:45 का समय हो गया।बस के छूट जाने की प्रबल संभावना देख मेंने प्रजापत जी से फोन कर चले जाने को कहा कि हम चम्बा,भरमौर या हड़सर में मिल जायेंगे।
मेंने शुलभ काम्पलैक्स वाले लड़के से,जो उस समय अपने केबिन में मछली पका रहा था,पूछा "भाई इस जगह को क्या बोलते हैं।"
वो बोला "गाँधी चौक"
मेंने फिर पूछा "चंबा की बसें यहीं होकर गुजरती हैं ना?"
उसने कहा "हन्जी इत्थे होकर ई जांदी ऐं"
मेंने पठानकोट के मैप से पूर्व में ही अंदाज लगा लिया था कि बसें यहीं होकर जाती होंगी।चूंकि अभी वहाँ से कोई बस नहीं गुजरी थी तो मेंने तुरंत प्रजापत जी को फोन किया कि वे परिचालक से पूछें कि बस गाँधी चौक होकर जायेगी क्या?
कन्डक्टर ने बताया कि बस बाईपास होकर जायेगी,अगर आपके साथियों को चलना है तो 10 मिनट में "सिंबल चौक" आ जायें।
मेंने स्नान का विचार त्याग दिया क्योंकि इस बस को छोड़ने का मतलब था कि आज हड़सर किसी भी स्थिति में नहीं पहुंच पायेंगे।
मेंने बाहर दौड कर एक ऑटो रुकवाया अतुल भाईसाब को जल्द चलने को बोला।ऑटो वाले ने 60रुपये बोले,मोलभाव का तो प्रश्न ही नहीं था।ऑटो में बैठे ही प्रजापत जी को फोन किया कि 2सीट रोक कर रखें,हम सिंबल चौक पहुंच रहे हैं।
11बजे हम सिंबल चौक पर थे।चंबा,धर्मशाला व काँगड़ा का रास्ता इसी चौक से होकर गुजरता है।यहाँ 'सिंबल' नामक सैनिक छावनी है इसीलिये यह 'सिंबल चौक' कहलाता है।
बस वाले ने टायर व हवा चैक करवाने में सिंबल चौक पहुंचने में 11:30 बजा दिये।प्रजापत जी ने जो 2 सीट रोकीं थी उन पर चंबा की एक नवदंपती यह कह कर बैठ गयी कि आपकी सवारी आयेंगी तो उठ जायेंगे।हम 11:30 बजे हिमाचल परिवहन की बस में चढ़ गये।अब वो दंपती सीट छोड़ने में आनाकानी करने लगी। मैं 5 घंटे खड़ा नहीं रहना चाहता था तो महिला को बैठे रहने दिया व कंडक्टर को प्रजापत जी ने अपनी 4 टिकटें दिखाकर बोले कि ये 4 सीटें हमारी हैं।उन्होंने चौथा आदमी पहले ही अलग सीट पर बिठा दिया था।हम दोनों व प्रजापत जी के साथी सोनू जी 2×2 सीट पर एडजस्ट हो गये(सोनू जी इस यात्रा के प्रमुख पात्र बन कर उभरेंगे)।उस दिन मेंने मारवाड़ी बुद्धि के प्रत्यक्ष दर्शन किये😊।पठानकोट से निकलते ही खड़ी चढाई प्रारंभ हो जाती है जिस पर बस रेंगती हुई आगे बढती है।कुछ समय बाद शिवालिक श्रेणी से होकर पंजाब से हिमाचल में प्रवेश करते हैं।"दुनेरा" नामक स्थान इस मार्ग पर पंजाब का आखिरी गाँव है।शिवालिक श्रेणी हिमालय की नवीनतम श्रेणी हैं जो लगभग 2400किमी तक विस्तृत है। ये कालांतर में नदियों द्वारा वृहद हिमालय से लाये गये निक्षेप से निर्मित हुई लगती हैं।बालू समान मिट्टी में शालिग्राम जैसे पत्थर गुंथ कर पर्वत का रूप ले लेते हैं।संभवतः यहाँ सर्वाधिक लैंडस्लाईड होते होंगे।
कुछ ही आगे चलने पर रास्ते में यात्रियों हेतु अनेक लंगर(भंडारा) मिलते हैं।जैसे ही कोई लंगर आता है लंगर को देख मेरे बगल में बैठे सोनू जी के गुदगुदी हो उठती है व उनकी आँखें एक विशेष आभा से प्रतिदीप्त मालूम पड़ती हैं।दरअसल सोनू जी के लंगरप्रेम से हम भरमौर व हड़सर में ही वास्तविक परिचित होते हैं।
आगे पूरा रास्ता घुमावों वाला है जिस पर शीघ्र ही मन उल्टी होने जैसा अजीब सा होने लगता है।नागिन जैसी बल खाती सड़क पर बस मंद गति से चलती रहती है।धीरे धीरे बस ऊपर चढती जाती है तो परिदृश्य सुंदरतम होता चला जाता है।मैं खिड़की से परिदृश्य निहारता हूं,अतुल भाईसाब कोई म्यूजिक सुनने में व्यस्त हैं,प्रजापत जी व उनके साथ बैठा साथी सो गये हैं,चंबा की दंपती एक सीट पर एडजस्ट हो गयी है और सोनू जी मन ही मन प्रार्थना कर रहे हैं कि बस जल्द ही किसी लंगर(भंडारा)पर रुक जाये।हरी भरी वादियों से अब मन थोडा रिलीफ फील कर यहा है।सघन वनस्पति की गंध बस के अन्दर तक आकर मन को खुशनुमा बना रही है।नीचे दूर एक झील है जिसके ऊपर घूम कर बस को दूसरी तरफ जाना है।बस अब अधिक घुमावदार रास्ते पर आगे बढ़ती है तो मन फिर से खराब सा होने लगता है। बैग से माउथ फ्रेशनर निकाल कर खा लेता हूं।अब थोडा ठीक लगता है।फिर भी मन उल्टी करने जैसा हो रहा होता है।इतने में बस 'नैनी खड्ड' नामक जगह पर रुक जाती है।बस से बाहर निकल कर मन कुछ हल्का हो जाता है।नैनीखड्ड पठान कोट चंबा मार्ग पर स्थित छोटा सा स्थान है।जहाँ भोजनालय व कोल्डड्रिंक शोप हैं।हमने कोल्ड ड्रिंक व चिप्स खरीद लीं।पास में ही बहते हुए झरने पर एक नली लगी हुई थी। उस पर पानी पीकर बोतल को भी भर लिया।अतुल भाईसाब उल्टी कर अब अच्छा फील कर रहे थे।नीचे घाटी में कल-कल करती नदी बह रही थी जिसका जल बिल्कुल पारदर्शी था।हमने यहाँ कुछ तस्वीरें ली।पीछे से चिन्तापूर्णी वाली एक बस और आकर रुक गयी। कंडक्टर ने व्हिशिल बजाई व कुछ समय बाद हमारी बस फिर से उन्हीं घुमावदार रास्तों पर यहाँ से चंबा के लिये चल दी।
क्रमशः...
दिनांक 15/09/2018
सुबह जल्द ही नींद खुल गयी,वैसे भी घर के अतिरिक्त अन्य स्थान पर मुझे गहरी नींद आती भी नहीं है।अतुल भाई साब अल-सुबह ही बोगी के शौचालयों का निरीक्षण कर आये थे,जोकि अन्दर घुसने लायक स्थिति में भी नहीं थे।
हम भारतीय अत्यल्प सुविधाओं में बसर करने के अभ्यस्त होते हैं। ये भी कहा जा सकता है कि हमें सरकारी सुविधाओं को अविवेकपूर्ण दोहन द्वारा अत्यल्प सुविधाओं में परिवर्तित करने में महारत हासिल है। खैर पठानकोट पहुंच कर ही शौचादि से निवृत होने का विचार किया।सुबह जागने पर हम पंजाब में थे।पंजाब कृषि की दृष्टि से भारत का प्रमुख प्रांत है।यहाँ खरीफ में धान की फसल प्रमुखता से बोई जाती है।पठानकोट तक सतलुज, व्यास व चक्की नदी को पार करना पड़ता है।
साथ वाली बर्थों पर बैठे खंडवा(म.प्र) के किसी गाँव के कुछ परिवार वैष्णोदेवी यात्रा के लिये जा रहे थे।अगर सहयात्रियों से वार्तालाप प्रारंभ करना हो तो वर्तमान राजनीति पर थोड़ी चर्चा प्रारंभ कर दीजिये;शीघ्र ही उनके अन्दर का सुकरात,लेनिन या कार्ल मार्क्स आदि बाहर निकल आता है।आपको उनके विचारों से थोड़ी समानता स्थापित करने हेतु हाँ में हाँ भर करनी होती है।ऐसा करने पर सहयात्रियों से आपकी प्रगाढ़ता स्थापित होने से कोई नहीं रोक सकता।
वे लोग शिवराज चौहान के राजकार्य की प्रशंसा करते रहे व अत्यल्प समय में ही मेंने अनमने मन से उनसे कपास,सोयाबीन,प्याज की कृषि का ज्ञान ग्रहण कर लिया।
इस समय जालंधर में घटाऐं छाई हुई थीं।थोड़ी देर में ही बारिश प्रारंभ हो गयी हमारी ट्रेन जालंधर पर रुकी रही व ओमप्रकाश जी की ट्रेन आगे निकल गयी।(ओपी प्रजापत जी नोखा बीकानेर से हैं व हमारा एक घुमक्कड़ी ग्रुप द्वारा परिचय हुआ था, ओपी जी 3 अन्य लोगों के साथ यात्रा पर थे)
दसुया व मुकैरिआन के बीच में कहीं एक दीवार पर छपे डाॅ. बंगाली व हकीम सुलेमानी के विज्ञापन ने मेरी पंजाबियों की मर्दानगी संबंधी धारणा को बदल दिया😉😉।यह भी स्पष्ट हो गया कि डाॅ.बंगाली यूपी राजस्थान तक ही सीमित नहीं है वस्तुतः वह तो एक मल्टीनेशनल ब्रांड है😉😉।
खैर रोते पड़ते 9:45AM तक ट्रेन ने हमें पठानकोट ला पटका।पठानकोट केंट स्टेशन पर शौचालय व नहाने के लिये प्रतीक्षालय में स्थान निर्धारित है किंतु वहाँ प्रायः लाईन देखी जा सकती है।हम स्टेशन से बाहर आये और बस स्टैण्ड के लिये ऑटो में बैठ गये।ओ.पी जी टीम सहित बस स्टैंड पहुंच चुके थे व 10:45 की बस में चंबा के लिये सीट भी बुक करवा ली।हमें अभी नित्यकर्म से निवृत होना था सो मेंने गूगल मैप पर सुलभ काॅम्लैक्स सर्च किया जो बस स्टैण्ड के रास्ते में गाँधी चौक पर स्थित था।हम गाँधी चौक उतर कर नित्यकर्म से फारिग हुए इतने में 10:45 का समय हो गया।बस के छूट जाने की प्रबल संभावना देख मेंने प्रजापत जी से फोन कर चले जाने को कहा कि हम चम्बा,भरमौर या हड़सर में मिल जायेंगे।
मेंने शुलभ काम्पलैक्स वाले लड़के से,जो उस समय अपने केबिन में मछली पका रहा था,पूछा "भाई इस जगह को क्या बोलते हैं।"
वो बोला "गाँधी चौक"
मेंने फिर पूछा "चंबा की बसें यहीं होकर गुजरती हैं ना?"
उसने कहा "हन्जी इत्थे होकर ई जांदी ऐं"
मेंने पठानकोट के मैप से पूर्व में ही अंदाज लगा लिया था कि बसें यहीं होकर जाती होंगी।चूंकि अभी वहाँ से कोई बस नहीं गुजरी थी तो मेंने तुरंत प्रजापत जी को फोन किया कि वे परिचालक से पूछें कि बस गाँधी चौक होकर जायेगी क्या?
कन्डक्टर ने बताया कि बस बाईपास होकर जायेगी,अगर आपके साथियों को चलना है तो 10 मिनट में "सिंबल चौक" आ जायें।
मेंने स्नान का विचार त्याग दिया क्योंकि इस बस को छोड़ने का मतलब था कि आज हड़सर किसी भी स्थिति में नहीं पहुंच पायेंगे।
मेंने बाहर दौड कर एक ऑटो रुकवाया अतुल भाईसाब को जल्द चलने को बोला।ऑटो वाले ने 60रुपये बोले,मोलभाव का तो प्रश्न ही नहीं था।ऑटो में बैठे ही प्रजापत जी को फोन किया कि 2सीट रोक कर रखें,हम सिंबल चौक पहुंच रहे हैं।
11बजे हम सिंबल चौक पर थे।चंबा,धर्मशाला व काँगड़ा का रास्ता इसी चौक से होकर गुजरता है।यहाँ 'सिंबल' नामक सैनिक छावनी है इसीलिये यह 'सिंबल चौक' कहलाता है।
बस वाले ने टायर व हवा चैक करवाने में सिंबल चौक पहुंचने में 11:30 बजा दिये।प्रजापत जी ने जो 2 सीट रोकीं थी उन पर चंबा की एक नवदंपती यह कह कर बैठ गयी कि आपकी सवारी आयेंगी तो उठ जायेंगे।हम 11:30 बजे हिमाचल परिवहन की बस में चढ़ गये।अब वो दंपती सीट छोड़ने में आनाकानी करने लगी। मैं 5 घंटे खड़ा नहीं रहना चाहता था तो महिला को बैठे रहने दिया व कंडक्टर को प्रजापत जी ने अपनी 4 टिकटें दिखाकर बोले कि ये 4 सीटें हमारी हैं।उन्होंने चौथा आदमी पहले ही अलग सीट पर बिठा दिया था।हम दोनों व प्रजापत जी के साथी सोनू जी 2×2 सीट पर एडजस्ट हो गये(सोनू जी इस यात्रा के प्रमुख पात्र बन कर उभरेंगे)।उस दिन मेंने मारवाड़ी बुद्धि के प्रत्यक्ष दर्शन किये😊।पठानकोट से निकलते ही खड़ी चढाई प्रारंभ हो जाती है जिस पर बस रेंगती हुई आगे बढती है।कुछ समय बाद शिवालिक श्रेणी से होकर पंजाब से हिमाचल में प्रवेश करते हैं।"दुनेरा" नामक स्थान इस मार्ग पर पंजाब का आखिरी गाँव है।शिवालिक श्रेणी हिमालय की नवीनतम श्रेणी हैं जो लगभग 2400किमी तक विस्तृत है। ये कालांतर में नदियों द्वारा वृहद हिमालय से लाये गये निक्षेप से निर्मित हुई लगती हैं।बालू समान मिट्टी में शालिग्राम जैसे पत्थर गुंथ कर पर्वत का रूप ले लेते हैं।संभवतः यहाँ सर्वाधिक लैंडस्लाईड होते होंगे।
कुछ ही आगे चलने पर रास्ते में यात्रियों हेतु अनेक लंगर(भंडारा) मिलते हैं।जैसे ही कोई लंगर आता है लंगर को देख मेरे बगल में बैठे सोनू जी के गुदगुदी हो उठती है व उनकी आँखें एक विशेष आभा से प्रतिदीप्त मालूम पड़ती हैं।दरअसल सोनू जी के लंगरप्रेम से हम भरमौर व हड़सर में ही वास्तविक परिचित होते हैं।
आगे पूरा रास्ता घुमावों वाला है जिस पर शीघ्र ही मन उल्टी होने जैसा अजीब सा होने लगता है।नागिन जैसी बल खाती सड़क पर बस मंद गति से चलती रहती है।धीरे धीरे बस ऊपर चढती जाती है तो परिदृश्य सुंदरतम होता चला जाता है।मैं खिड़की से परिदृश्य निहारता हूं,अतुल भाईसाब कोई म्यूजिक सुनने में व्यस्त हैं,प्रजापत जी व उनके साथ बैठा साथी सो गये हैं,चंबा की दंपती एक सीट पर एडजस्ट हो गयी है और सोनू जी मन ही मन प्रार्थना कर रहे हैं कि बस जल्द ही किसी लंगर(भंडारा)पर रुक जाये।हरी भरी वादियों से अब मन थोडा रिलीफ फील कर यहा है।सघन वनस्पति की गंध बस के अन्दर तक आकर मन को खुशनुमा बना रही है।नीचे दूर एक झील है जिसके ऊपर घूम कर बस को दूसरी तरफ जाना है।बस अब अधिक घुमावदार रास्ते पर आगे बढ़ती है तो मन फिर से खराब सा होने लगता है। बैग से माउथ फ्रेशनर निकाल कर खा लेता हूं।अब थोडा ठीक लगता है।फिर भी मन उल्टी करने जैसा हो रहा होता है।इतने में बस 'नैनी खड्ड' नामक जगह पर रुक जाती है।बस से बाहर निकल कर मन कुछ हल्का हो जाता है।नैनीखड्ड पठान कोट चंबा मार्ग पर स्थित छोटा सा स्थान है।जहाँ भोजनालय व कोल्डड्रिंक शोप हैं।हमने कोल्ड ड्रिंक व चिप्स खरीद लीं।पास में ही बहते हुए झरने पर एक नली लगी हुई थी। उस पर पानी पीकर बोतल को भी भर लिया।अतुल भाईसाब उल्टी कर अब अच्छा फील कर रहे थे।नीचे घाटी में कल-कल करती नदी बह रही थी जिसका जल बिल्कुल पारदर्शी था।हमने यहाँ कुछ तस्वीरें ली।पीछे से चिन्तापूर्णी वाली एक बस और आकर रुक गयी। कंडक्टर ने व्हिशिल बजाई व कुछ समय बाद हमारी बस फिर से उन्हीं घुमावदार रास्तों पर यहाँ से चंबा के लिये चल दी।
क्रमशः...


कहानी लंबी लेकिन दिलचस्प लग रही है
ReplyDeleteधन्यवाद।
Deleteसाथ बनाये रखियेगा।
बेसब्री से इन्तजार है अगले भाग का
ReplyDeleteशीघ्र ही।
Deleteशुक्रिया।
अच्छा है ।
ReplyDeleteथैंक्स सर।
Deleteबहुत अच्छा भाई
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Deleteवाह जी वाह, बहुत धार है आपकी लेखनी में 👌😊🙏
ReplyDeleteआभार उदय जी🙏
Deleteअद्भुत सुंदर
ReplyDeleteआभार।
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