मणिमहेश कैलास चंबा
मणिमहेश यात्रा (भाग 3)
दिनांक:- 15/09/2018
नैनी खड्ड से आगे बढ़ने पर ऊँचाई बढ़ती जाती है व पर्वतों के ढलानों पर चीड़ व देवदार के वृक्षों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है।रास्ते में एक जगह लेंडस्लाइड़ वाला वह स्थान भी मिलता है जो कुछ दिन पूर्व टी.वी न्यूज में दिखाया जा रहा था।जहाँ हम लोगों के लिये लैंडस्लाईड भय का विषय है वहीं दूसरी ओर यह पहाडी लोगों की दैनिक जीवनचर्या में सम्मिलित है।बस में अधिकांश मणिमहेश जाने वाले यात्री ही बैठे थे।इनमें से कुछ पूर्व में यह यात्रा कर चुके हैं,वो अपने अनुभव साझा कर रहे थे।लगभग घंटे भर के बाद बस "बनिखेत" पहुंचती है।डलहौजी में पर्यटक अतिभारण के कारण बनिखेत में होटल उद्योग ने विशाल रूप ले लिया है।बनिखेत से दाँयी तरफ डलहौजी के लिये रास्ता गया है जो खज्जियार होते हुए चंबा को भी निकल जाता है।खज्जियार से एक रास्ता "चुवाडी" के लिये भी निकलता है,जिससे धर्मशाला जाया जा सकता है।
हमारी बस डलहौजी मोड़ पर सवारी उतारने व सवारी लेने के लिये रुकती है।हमारी बस से पहली वाली बस के ब्रेकडाउन होने के कारण यहाँ बहुत लोग खड़े मिलते हैं जिनमें से कुछ सवारियों को कंडक्टर चढा लेता है व शेष को पीछे आ रही चिन्तपूर्णी वाली बस से आ जाने को बोलता है। थोड़ा आगे बढ़ते ही बनिखेत में एक लंगर लगा हुआ होता है,जिसे देखकर सोनू जी मुझसे ड्राईवर द्वारा बस को यहाँ न रोकने की शिकायत करते हैं।
बनिखेत से आगे 'बाथरी' तक रास्ता थोडा ढलानयुक्त है।बाथरी बनिखेत से छोटा कस्बा है जहाँ बैंक ATM सुविधा उपलब्ध है।यहाँ बस एक लंगर पर सवारी लेने को रुकती है।इतने में सोनू जी वहाँ से खीर के कई दोंना लेकर हमें वितरित कर देते हैं तथा अपने लिये पूड़ी व मटर-पनीर ले लेते हैं। बाथरी के आसपास पहाड़ी ढलानों पर कई गाँव बसे हुए हैं। बाथरी से आगे एक और कोई बड़ा गाँव पड़ता है जहाँ बैंक भी है,मुझे अब इसका नाम याद नहीं आ रहा।इससे आगे एक और बड़ा गाँव "चनेड़" पड़ता है। चनेड़ में घुसने से पूर्व सडक पर बाँयी ओर वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल लिखा हुआ गेट मिलता है,लेकिन स्कूल कहीं नहीं दिखता।पेशे से अध्यापक होने के कारण इस तरफ ध्यानाकर्षण स्वभाविक ही था। जब घूमकर दूसरी तरफ पहुंचते हैं तो घाटी में नीचे स्कूल दिखाई देता है।स्कूल के गेट का उस तरफ रोड पर होना मेरी समझ में अब तक नहीं आया।
चनेड़ के आसपास बहुत सारे छोटे-मोटे गाँव पड़ते हैं।यहाँ घाटी में ढलानों पर सीढ़ीदार खेती की जाती है।यहाँ खरीफ में मक्का प्रमुखता से बोयी जाती है।चनेड के बगल में "चमेरा डैम" स्थित है,जो बाथरी से ही प्रारंभ हो जाता है। बाथरी से कुछ समय बाद बस "चमेरा डैम" के ऊपर पहुंचती है।चमेरा बाँध रावी नदी पर पहाड़ों से घिरा हुआ प्राकृतिक बाँध है।चमेरा डैम काफी बड़े क्षेत्र में विस्तृत है।यहाँ पर्यटकों हेतु बोटिंग का आयोजन भी किया जाता है।यहाँ जल विद्युत भी उत्पन्न की जाती है।बस यहाँ से लेकर चम्बा तक व चम्बा से खड़ामुख तक रावी नदी के साथ साथ ही आगे बढ़ती है।रावी नदी का पानी स्लेटी रंग का है जो शायद स्लिट पत्थर की अधिकता के कारण है।बस चमेरा डैम के ऊपर घूमकर ऊँचाई पर चढ़ती जाती है।यहाँ मार्ग के दोनों तरफ चीड़ के लम्बे लम्बे वृक्ष हैं।इस सुंदरतम प्राकृतिक परिवेश में रमते हुए हम चंबा पहुंचते हैं।चंबा जिला मुख्यालय है जिसके एक तरफ जम्मू काश्मीर,लाहौल स्पीति हैं।वहीं दूसरी तरफ धर्मशाला,पंजाब है।चंबा पहाडी घाटी में रावी नदी के किनारे बसा सुंदर शहर है।
बस लगभग 4:00बजे चंबा बस स्टैण्ड आकर रुकती है।कंडक्टर मणिमहेश जाने वालों को बस में ही बैठे रहने को बोलता है।चंबा की सवारी उतर जाती हैं।ड्राईवर बस को बस स्टैण्ड से जुडे वर्कशाॅप में अंदर ले जाकर रोक देता है।कंडक्टर हमें बस से उतरने को बोलता है कि आपके लिये अभी दूसरी बस की व्यवस्था कर रहे हैं जो आपको"भरमौर" ले जायेगी।
मैं वहाँ से स्टैण्ड पर आ जाता हूं।यहाँ भरमौर के लिये एक बस लगी हुई है किंतु फुल भरी हुई है।पास में ही भरमौर की दूसरी खाली बस भी खडी थी जो इसके बाद जायेगी।मैंने तुरंत इस बस में चढ़ कर सीटों पर बैग रख दिये।प्रजापत जी को भी सीट बुक कर फोन किया कि सभी सवारी आ जायें यहाँ बस खडी हुई है।मैं जानता था कि हमारी बस की सभी सवारियाँ आ जाने पर यह बस जल्द ही भर कर चल देगी।बस जल्दी ही खचाखच भर गयी और लगभग 4:30बजे चंबा से भरमौर के लिये रवाना हुई।
हम बाँयी वाली सीट पर बैठे थे।चंबा से 'गुरार' के निकट स्थित पुल तक बाँयी तरफ पहाड़ है।पुल पार कर लेने पर पहाड़ दाँयी तरफ हो जाता है व हमारी तरफ सुंदरतम घाटी,जिसमें कल-कल करती रावी नदी बह रही थी।भरमौर तक इस मार्ग में अनगिनत झरने मिलते हैं।इस घाटी में विरल वनस्पति है।कुछ देर बाद बस लगभग 500मीटर लंबी एक सुरंग से होकर गुजरती है।सुरंग के बगल में ही चमेरा बाँध-2 निर्मित है,जिस पर पनबिजली बनाई जाती है।यहीं थोडा आगे से बाँयी तरफ 'टुंडाह अभयारण्य' व 'बन्नी माता मंदिर' के लिये रास्ता जाता है।हिमाचल में देवी व शिव के अनगिनत मंदिर हैं।
थोडा आगे खड़ामुख स्थान से बाँयी ओर भरमौर के लिए मार्ग अलग हो जाता है।यह सीधा मार्ग 'होली' कस्बा के लिए जाता है।बाँयी तरफ रावी को पार कर एकदम खड़ी चढाई प्रारंभ होती है।कई मोडों से होकर खडी चढाई द्वारा बस पहाड के ऊपर पहुंचती है जहाँ से नीचे की गहरी घाटी को देखकर सिहरन दौड जाती है।यहाँ से आगे हमें अँधेरा हो जाता है।अंधेरा होते ही ड्राईवर का 'माईकल शूमाकर मोड़' ऐक्टिव हो जाता है।अब जैसे ही कोई मोड़ आता है तो स्पीड कम करने की बजाय वह गति बढा देता है।कुछ ही मोडों के बाद मेरा जी खराब होने लगता है।आगे वाली सीट पर 'लाहौल' जिले के 'उदयपुर' निवासी 'जैकी चैन' के हमशक्ल सुरेन्द्र शर्मा जी बैठे हैं जो अपनी बगल के सहयात्री को यात्रा की कठिनता बता कर भयभीत कर रहे हैं।आगे एक जगह जाम मिलता है उससे निकलने के बाद में आँखें बंद कर लेता हूं।
आँखें खुलती हैं...सामने भरमौर है,बस को पुलिस ने रोक दिया है,थोडी देर रुक कर बस चलती है।भरमौर में घुसते ही 2,3लंगर पड़ते हैं।सोनू जी के नेत्र उसी आभा से प्रतिदीप्त मालूम पड़ते हैं जो पूर्व में एक लंगर को देख हुए थे।लगभग 9:00PM पर हम बस स्टैण्ड पर होते हैं।यहाँ इस समय बहुत ठंड थी।हमें जैकेट पहनना अनिवार्य हो जाता है।
सुरेन्द्र शर्मा जी को 'सिटली' जाना है जो 'हडसर' वाले रास्ते पर ही पडता है।उनको आज ही वहाँ पहुंचना है।हम भी हड़सर चलने को सहमत हो जाते हैं।शर्मा जी कोई टैक्सी का जुगाड़ करते हैं इतने में सोनू जी दल-बल सहित पास के लंगर पर आक्रमण घोषित कर देते हैं।मैं व अतुल भाईसाब भी उनके दल को खोजते हुए लंगर में पहुंच उनके दल में सम्मिलित हो जाते हैं।दाल-चावल उड़ाने के बाद हम पानी पी रहे होते हैं,इतने में शर्मा जी एक टैक्सी को लेकर हमें ढूंढते आ जाते हैं।टैक्सी आधी पहले से ही भरी हुई थी,उसमें सोनू जी प्रजापति जी व उनके साथी बैठ गये।अब हमारे लिये उसमें कोई जगह ना थी।हम दोनों भरमौर ही रह गये।एक होमस्टे वाले से 200₹ में ठहरने की बात भी हो गयी इतने में हड़सर से लिए एक पीछे से खुली गाडी(207टाईप) मिल गयी।हमने तुरंत उसमें अपने बैग डाले व चढ़ गये।
ठंडी हवा से कंपकंपी बँध रही थी।रात्रि में ऊँचे ऊँचे पहाड़ और भी आकर्षक लग रहे थे।दूर किसी ढलान पर बसे गाँव के घरों की जलती लाइटें वहाँ जुगनू समष्टि होने का भ्रम उत्पन्न कर रही थीं।चीड़ व देवदार के वृक्ष अपनी नींद भंग होने के कारण हमें क्रोधपूर्ण दृष्टि से देखते हुए काले साये की मानिंद प्रतीत हो रहे थे।गाड़ी की कर्कश ध्वनि चिर नीरवता को भंग कर रही थी,जिसके प्रतिकार स्वरूप शीतल पवन हमारे चेहरों पर अपने ठिठुरते हाथों से थप्पड़ मार रही थी।मेरे लिये इतनी रात को आसमान छूते शिखरों के मध्य नीरव परिवेश में यात्रा करना रोमांचकारी अनुभव था।सभी लोग हिमालय में रात्रि को यात्रा या भ्रमण ना करने की सलाह देते हैं,जो सही भी है।भरमौर से हड़सर का मार्ग जितना खूबसूरत रात्रि में लगा उतना लौटते समय दिन में नहीं लगा।करीब 10:00PM बजे हम हड़सर पहुंच गये।हम उतरे ही थे कि बीकानेरी दल भी हमें वहीं गाड़ी से उतरता हुआ मिल गया।
उतरते ही सोनू जी फिर से लंगर के अंदर घुस गये।मेंने उनको आवाज देकर कहा कि वहाँ दूसरे लंगर में गुलाबजामुन,बर्फी,मटर-पनीर मिल रहा है।वो तुरंत इस लंगर से निकल आये और मुझसे कहा कि जल्दी चलिये उस भंडारे में।
ये बुढलाना पंजाब वालों का लंगर था।कडकडाती ठंड में रात के 10:30 बजे गर्मागर्म गुलाबजामुन मिल जायें,आदमी और क्या इच्छा करे।यहाँ सभी एक दूसरे को "भोले" नाम से संबोधित करते हैं।हम सबने यहाँ स्वादिष्ट खाने(प्रसादी) का लुत्फ उठाया।मैं कुछ ज्यादा ही खा गया जिससे सुबह पेट खराब हो गया।
इतनी रात्रि को पैदल यात्रा प्रारंभ करने का कोई औचित्य ही नहीं था।हमें अलसुबह यात्रा प्रारंभ करनी थी।सो खाना खाकर लंगर वाले मकान में ही ठहरने का प्रबंध हो गया।हम 6 लोगों के लिए 600₹ में सेपरेट रूम विद लेटबाथ मिल गया।रूम में पहुंच कपडे चेंज कर हम गप्पें मारने लगे।मेंने सोनू जी को बोला कि यहाँ से थोड़ी दूर एक लंगर वाला गर्मागर्म केसर का दूध पिला रहा है।मेंने समझा कि पेट फुल है ही तो सोनू जी मना कर देंगे किंतु वो ठहरे लंगर प्रेमी,बोले चलिये।में उनके द्वारा लंगरों के प्रति प्रकट की गयी उदारता के समक्ष नतमस्तक हूं।खैर 11:00बजे चल दिये दूध पीने।सोनू जी ने रास्ते में जाते व आते समय अपनी पूर्व अमरनाथ यात्रा के लंगरों से संबंधित संस्मरण सुनाये।11:30 बजे हम अन्य लंगरों को उपकृत कर अपने रूम में पहुंचे।बाकी साथी हमें सोते हुए मिले।और मैं भी सोनू जी के संस्मरणों के बारे में विचार करता हुआ सो गया...
क्रमशः...
हड़सर में कुगती अभयारण्य का बोर्ड
हडसर में जिस जगह रुके(सुबह की तस्वीर)
चुनेड के विद्यालय की तस्वीर
दिनांक:- 15/09/2018
नैनी खड्ड से आगे बढ़ने पर ऊँचाई बढ़ती जाती है व पर्वतों के ढलानों पर चीड़ व देवदार के वृक्षों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है।रास्ते में एक जगह लेंडस्लाइड़ वाला वह स्थान भी मिलता है जो कुछ दिन पूर्व टी.वी न्यूज में दिखाया जा रहा था।जहाँ हम लोगों के लिये लैंडस्लाईड भय का विषय है वहीं दूसरी ओर यह पहाडी लोगों की दैनिक जीवनचर्या में सम्मिलित है।बस में अधिकांश मणिमहेश जाने वाले यात्री ही बैठे थे।इनमें से कुछ पूर्व में यह यात्रा कर चुके हैं,वो अपने अनुभव साझा कर रहे थे।लगभग घंटे भर के बाद बस "बनिखेत" पहुंचती है।डलहौजी में पर्यटक अतिभारण के कारण बनिखेत में होटल उद्योग ने विशाल रूप ले लिया है।बनिखेत से दाँयी तरफ डलहौजी के लिये रास्ता गया है जो खज्जियार होते हुए चंबा को भी निकल जाता है।खज्जियार से एक रास्ता "चुवाडी" के लिये भी निकलता है,जिससे धर्मशाला जाया जा सकता है।
हमारी बस डलहौजी मोड़ पर सवारी उतारने व सवारी लेने के लिये रुकती है।हमारी बस से पहली वाली बस के ब्रेकडाउन होने के कारण यहाँ बहुत लोग खड़े मिलते हैं जिनमें से कुछ सवारियों को कंडक्टर चढा लेता है व शेष को पीछे आ रही चिन्तपूर्णी वाली बस से आ जाने को बोलता है। थोड़ा आगे बढ़ते ही बनिखेत में एक लंगर लगा हुआ होता है,जिसे देखकर सोनू जी मुझसे ड्राईवर द्वारा बस को यहाँ न रोकने की शिकायत करते हैं।
बनिखेत से आगे 'बाथरी' तक रास्ता थोडा ढलानयुक्त है।बाथरी बनिखेत से छोटा कस्बा है जहाँ बैंक ATM सुविधा उपलब्ध है।यहाँ बस एक लंगर पर सवारी लेने को रुकती है।इतने में सोनू जी वहाँ से खीर के कई दोंना लेकर हमें वितरित कर देते हैं तथा अपने लिये पूड़ी व मटर-पनीर ले लेते हैं। बाथरी के आसपास पहाड़ी ढलानों पर कई गाँव बसे हुए हैं। बाथरी से आगे एक और कोई बड़ा गाँव पड़ता है जहाँ बैंक भी है,मुझे अब इसका नाम याद नहीं आ रहा।इससे आगे एक और बड़ा गाँव "चनेड़" पड़ता है। चनेड़ में घुसने से पूर्व सडक पर बाँयी ओर वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल लिखा हुआ गेट मिलता है,लेकिन स्कूल कहीं नहीं दिखता।पेशे से अध्यापक होने के कारण इस तरफ ध्यानाकर्षण स्वभाविक ही था। जब घूमकर दूसरी तरफ पहुंचते हैं तो घाटी में नीचे स्कूल दिखाई देता है।स्कूल के गेट का उस तरफ रोड पर होना मेरी समझ में अब तक नहीं आया।
चनेड़ के आसपास बहुत सारे छोटे-मोटे गाँव पड़ते हैं।यहाँ घाटी में ढलानों पर सीढ़ीदार खेती की जाती है।यहाँ खरीफ में मक्का प्रमुखता से बोयी जाती है।चनेड के बगल में "चमेरा डैम" स्थित है,जो बाथरी से ही प्रारंभ हो जाता है। बाथरी से कुछ समय बाद बस "चमेरा डैम" के ऊपर पहुंचती है।चमेरा बाँध रावी नदी पर पहाड़ों से घिरा हुआ प्राकृतिक बाँध है।चमेरा डैम काफी बड़े क्षेत्र में विस्तृत है।यहाँ पर्यटकों हेतु बोटिंग का आयोजन भी किया जाता है।यहाँ जल विद्युत भी उत्पन्न की जाती है।बस यहाँ से लेकर चम्बा तक व चम्बा से खड़ामुख तक रावी नदी के साथ साथ ही आगे बढ़ती है।रावी नदी का पानी स्लेटी रंग का है जो शायद स्लिट पत्थर की अधिकता के कारण है।बस चमेरा डैम के ऊपर घूमकर ऊँचाई पर चढ़ती जाती है।यहाँ मार्ग के दोनों तरफ चीड़ के लम्बे लम्बे वृक्ष हैं।इस सुंदरतम प्राकृतिक परिवेश में रमते हुए हम चंबा पहुंचते हैं।चंबा जिला मुख्यालय है जिसके एक तरफ जम्मू काश्मीर,लाहौल स्पीति हैं।वहीं दूसरी तरफ धर्मशाला,पंजाब है।चंबा पहाडी घाटी में रावी नदी के किनारे बसा सुंदर शहर है।
बस लगभग 4:00बजे चंबा बस स्टैण्ड आकर रुकती है।कंडक्टर मणिमहेश जाने वालों को बस में ही बैठे रहने को बोलता है।चंबा की सवारी उतर जाती हैं।ड्राईवर बस को बस स्टैण्ड से जुडे वर्कशाॅप में अंदर ले जाकर रोक देता है।कंडक्टर हमें बस से उतरने को बोलता है कि आपके लिये अभी दूसरी बस की व्यवस्था कर रहे हैं जो आपको"भरमौर" ले जायेगी।
मैं वहाँ से स्टैण्ड पर आ जाता हूं।यहाँ भरमौर के लिये एक बस लगी हुई है किंतु फुल भरी हुई है।पास में ही भरमौर की दूसरी खाली बस भी खडी थी जो इसके बाद जायेगी।मैंने तुरंत इस बस में चढ़ कर सीटों पर बैग रख दिये।प्रजापत जी को भी सीट बुक कर फोन किया कि सभी सवारी आ जायें यहाँ बस खडी हुई है।मैं जानता था कि हमारी बस की सभी सवारियाँ आ जाने पर यह बस जल्द ही भर कर चल देगी।बस जल्दी ही खचाखच भर गयी और लगभग 4:30बजे चंबा से भरमौर के लिये रवाना हुई।
हम बाँयी वाली सीट पर बैठे थे।चंबा से 'गुरार' के निकट स्थित पुल तक बाँयी तरफ पहाड़ है।पुल पार कर लेने पर पहाड़ दाँयी तरफ हो जाता है व हमारी तरफ सुंदरतम घाटी,जिसमें कल-कल करती रावी नदी बह रही थी।भरमौर तक इस मार्ग में अनगिनत झरने मिलते हैं।इस घाटी में विरल वनस्पति है।कुछ देर बाद बस लगभग 500मीटर लंबी एक सुरंग से होकर गुजरती है।सुरंग के बगल में ही चमेरा बाँध-2 निर्मित है,जिस पर पनबिजली बनाई जाती है।यहीं थोडा आगे से बाँयी तरफ 'टुंडाह अभयारण्य' व 'बन्नी माता मंदिर' के लिये रास्ता जाता है।हिमाचल में देवी व शिव के अनगिनत मंदिर हैं।
थोडा आगे खड़ामुख स्थान से बाँयी ओर भरमौर के लिए मार्ग अलग हो जाता है।यह सीधा मार्ग 'होली' कस्बा के लिए जाता है।बाँयी तरफ रावी को पार कर एकदम खड़ी चढाई प्रारंभ होती है।कई मोडों से होकर खडी चढाई द्वारा बस पहाड के ऊपर पहुंचती है जहाँ से नीचे की गहरी घाटी को देखकर सिहरन दौड जाती है।यहाँ से आगे हमें अँधेरा हो जाता है।अंधेरा होते ही ड्राईवर का 'माईकल शूमाकर मोड़' ऐक्टिव हो जाता है।अब जैसे ही कोई मोड़ आता है तो स्पीड कम करने की बजाय वह गति बढा देता है।कुछ ही मोडों के बाद मेरा जी खराब होने लगता है।आगे वाली सीट पर 'लाहौल' जिले के 'उदयपुर' निवासी 'जैकी चैन' के हमशक्ल सुरेन्द्र शर्मा जी बैठे हैं जो अपनी बगल के सहयात्री को यात्रा की कठिनता बता कर भयभीत कर रहे हैं।आगे एक जगह जाम मिलता है उससे निकलने के बाद में आँखें बंद कर लेता हूं।
आँखें खुलती हैं...सामने भरमौर है,बस को पुलिस ने रोक दिया है,थोडी देर रुक कर बस चलती है।भरमौर में घुसते ही 2,3लंगर पड़ते हैं।सोनू जी के नेत्र उसी आभा से प्रतिदीप्त मालूम पड़ते हैं जो पूर्व में एक लंगर को देख हुए थे।लगभग 9:00PM पर हम बस स्टैण्ड पर होते हैं।यहाँ इस समय बहुत ठंड थी।हमें जैकेट पहनना अनिवार्य हो जाता है।
सुरेन्द्र शर्मा जी को 'सिटली' जाना है जो 'हडसर' वाले रास्ते पर ही पडता है।उनको आज ही वहाँ पहुंचना है।हम भी हड़सर चलने को सहमत हो जाते हैं।शर्मा जी कोई टैक्सी का जुगाड़ करते हैं इतने में सोनू जी दल-बल सहित पास के लंगर पर आक्रमण घोषित कर देते हैं।मैं व अतुल भाईसाब भी उनके दल को खोजते हुए लंगर में पहुंच उनके दल में सम्मिलित हो जाते हैं।दाल-चावल उड़ाने के बाद हम पानी पी रहे होते हैं,इतने में शर्मा जी एक टैक्सी को लेकर हमें ढूंढते आ जाते हैं।टैक्सी आधी पहले से ही भरी हुई थी,उसमें सोनू जी प्रजापति जी व उनके साथी बैठ गये।अब हमारे लिये उसमें कोई जगह ना थी।हम दोनों भरमौर ही रह गये।एक होमस्टे वाले से 200₹ में ठहरने की बात भी हो गयी इतने में हड़सर से लिए एक पीछे से खुली गाडी(207टाईप) मिल गयी।हमने तुरंत उसमें अपने बैग डाले व चढ़ गये।
ठंडी हवा से कंपकंपी बँध रही थी।रात्रि में ऊँचे ऊँचे पहाड़ और भी आकर्षक लग रहे थे।दूर किसी ढलान पर बसे गाँव के घरों की जलती लाइटें वहाँ जुगनू समष्टि होने का भ्रम उत्पन्न कर रही थीं।चीड़ व देवदार के वृक्ष अपनी नींद भंग होने के कारण हमें क्रोधपूर्ण दृष्टि से देखते हुए काले साये की मानिंद प्रतीत हो रहे थे।गाड़ी की कर्कश ध्वनि चिर नीरवता को भंग कर रही थी,जिसके प्रतिकार स्वरूप शीतल पवन हमारे चेहरों पर अपने ठिठुरते हाथों से थप्पड़ मार रही थी।मेरे लिये इतनी रात को आसमान छूते शिखरों के मध्य नीरव परिवेश में यात्रा करना रोमांचकारी अनुभव था।सभी लोग हिमालय में रात्रि को यात्रा या भ्रमण ना करने की सलाह देते हैं,जो सही भी है।भरमौर से हड़सर का मार्ग जितना खूबसूरत रात्रि में लगा उतना लौटते समय दिन में नहीं लगा।करीब 10:00PM बजे हम हड़सर पहुंच गये।हम उतरे ही थे कि बीकानेरी दल भी हमें वहीं गाड़ी से उतरता हुआ मिल गया।
उतरते ही सोनू जी फिर से लंगर के अंदर घुस गये।मेंने उनको आवाज देकर कहा कि वहाँ दूसरे लंगर में गुलाबजामुन,बर्फी,मटर-पनीर मिल रहा है।वो तुरंत इस लंगर से निकल आये और मुझसे कहा कि जल्दी चलिये उस भंडारे में।
ये बुढलाना पंजाब वालों का लंगर था।कडकडाती ठंड में रात के 10:30 बजे गर्मागर्म गुलाबजामुन मिल जायें,आदमी और क्या इच्छा करे।यहाँ सभी एक दूसरे को "भोले" नाम से संबोधित करते हैं।हम सबने यहाँ स्वादिष्ट खाने(प्रसादी) का लुत्फ उठाया।मैं कुछ ज्यादा ही खा गया जिससे सुबह पेट खराब हो गया।
इतनी रात्रि को पैदल यात्रा प्रारंभ करने का कोई औचित्य ही नहीं था।हमें अलसुबह यात्रा प्रारंभ करनी थी।सो खाना खाकर लंगर वाले मकान में ही ठहरने का प्रबंध हो गया।हम 6 लोगों के लिए 600₹ में सेपरेट रूम विद लेटबाथ मिल गया।रूम में पहुंच कपडे चेंज कर हम गप्पें मारने लगे।मेंने सोनू जी को बोला कि यहाँ से थोड़ी दूर एक लंगर वाला गर्मागर्म केसर का दूध पिला रहा है।मेंने समझा कि पेट फुल है ही तो सोनू जी मना कर देंगे किंतु वो ठहरे लंगर प्रेमी,बोले चलिये।में उनके द्वारा लंगरों के प्रति प्रकट की गयी उदारता के समक्ष नतमस्तक हूं।खैर 11:00बजे चल दिये दूध पीने।सोनू जी ने रास्ते में जाते व आते समय अपनी पूर्व अमरनाथ यात्रा के लंगरों से संबंधित संस्मरण सुनाये।11:30 बजे हम अन्य लंगरों को उपकृत कर अपने रूम में पहुंचे।बाकी साथी हमें सोते हुए मिले।और मैं भी सोनू जी के संस्मरणों के बारे में विचार करता हुआ सो गया...
क्रमशः...
हड़सर में कुगती अभयारण्य का बोर्ड
हडसर में जिस जगह रुके(सुबह की तस्वीर)
चुनेड के विद्यालय की तस्वीर




Guruji aage ki yatra ka anubhav sheeghra sajha kijiyega..
ReplyDeleteजरूर
DeleteBahut hi umda likha he
ReplyDeleteThanks
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