*मणिमहेश कैलास यात्रा*

       मणिमहेश यात्रा(भाग4)
       (हड़सर से गौरीकुंड,मणिमहेश)
       दिनांक:- 16/09/2018
                      मैं सुबह सबसे पीछे उठा।ऊपर लंगर वालों ने नहाने के लिये गर्म पानी किया हुआ था।हमने सुबह 7 बजे नहा व नाश्ता कर यात्रा प्रारंभ कर दी।प्रजापत जी हमसे लगभग आधा घंटा पहले निकल लिये थे।बैग को 50₹ में एक दुकान पर पहले ही रख दिया था। लैंडस्लाइड के कारण यात्रा के लिये नीचे कुगती मार्ग से नया रास्ता बनाया गया है।यात्रा का मार्ग मणिमहेश गंगा के साथ साथ आगे बढ़ता है।शुरुआत के 15-20 मिनिटों में ही मुझे यात्रा की कठिनाई का पूर्वाभास हो गया।हड़सर (2200मीटर)से मणिमहेश(4500मीटर) लगभग 14किमी दूर है।इस 14किमी के फासले में लगभग 2300मीटर की ऊँचाई ऊबड-खाबड मार्ग पर चढ़नी होती है।थोडा आगे चलने पर हडसर की तरफ एक हिमाच्छादित शुभ्र शिखर दिखाई पड़ा जिस पर सूर्य-रश्मियाँ टकरा कर चहुंओर बिखर रही थीं।
   'दुनाली' नामक स्थान पर एक लंगर लगा हुआ था।हालांकि मेरा पेट खराब था परन्तु ऊँचाई चढ़ने के लिये ऊर्जा भी तो चाहिये।यहाँ दही पूड़ी-सब्जी खाकर आगे चल दिये।प्रजापत जी भी दल सहित मिल गये।भोले का जयघोष करते हुए 'धन्चो' से पहले पडने वाले लकडी के पुल पर पहुंचे,जिस पर कलावे के रक्षासूत्रों का जाल बुना हुआ था।यहाँ कुछ तस्वीर लेने के वाद धन्चो के लिये खड़ी चढाई प्रारंभ की।यहीं सुरेन्द्र शर्मा जी अपने सहयात्री के साथ मिल गये।शर्मा जी ठहरे पहाड़ी,उनका अपना क्या मुकाबला।वो खरगोश बन आगे निकल गये,और हम कछुआ से घोंघा बनने की प्रक्रिया में लग गये।
धन्चो से आगे तीन रास्ते छँटते हैं।पहला 'बन्दरघाटी' होकर,दूसरा 'फव्वारा मार्ग' और तीसरा मुख्य मार्ग।हमने लंगर वाले से रास्तों की उपयुक्तता के विषय में पूछा तो उसने बन्दरघाटी का सुझाव दिया कि यह शाॅर्ट है।हम बन्दरघाटी मार्ग पर थोड़ा चल कर वापस लौट आये क्योंकि वहाँ सीधी खड़ी चढाई थी,जिसे चढने की हालत में हम कतई नहीं थे।हमने फव्वारा मार्ग लिया।आगे एक विशाल झरना है जिस पर पहुंच कुछ तस्वीर लेकर आगे बढ गये।इस रास्ते पर खडी चढाई व फिसलन इसे खतरनाक बनाती है।वर्षा के समय तो यह रास्ता बिल्कुल नहीं लेना चाहिए।थोडा ऊपर चढ़ कर फव्वारा मार्ग व मुख्य मार्ग मिल जाते हैं।यहाँ से आगे बढने पर पुनः दो रास्ते छँटते है।एक 'सुंदरासी' के लिए दूसरा गौरीकुंड हैलीपैड मार्ग।हमने सुंदरासी मार्ग लिया जो कि हैलीपैड मार्ग से लम्बा किंतु अपेक्षाकृत कम जटिल है।पुल पार करने के बाद आने वाली चढाइयों पर मेरे पैर जबाव देने लगे।मैं बैठ गया,अब यहाँ से आगे बढ़ने का बिल्कुल भी मन नहीं हो रहा था।पास में ही 'सोलन' का एक परिवार बैठा था,जिसमें एक मोटी महिला भी थी।उसे चढ़ते देख मन में विचार किया कि जब ये चढ सकती है तो मैं क्यों नहीं? ये बात अलग है कि वो सुंदरासी से खच्चर पर बैठ कर गौरीकुंड पहुंच गयी और मैं गौरीकुंड में उससे मिलने तक मन ही मन उसकी जीवटता को प्रणाम करता रहा।एक 'चंबा' की महिला नंगे पैर चल रही थी वहीं एक बिना पैरों वाला व्यक्ति वैसाखी के सहारे चढाई कर रहा था।ऐसे लोगों की प्रेरणा के कारण ही मेरा गौरीकुंड तक पहुंचना संभव हुआ।
  हडसर से सुंदरासी तक सामने विशाल पर्वतों को देख कर कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि बस अब घाटी समाप्त,किंतु आगे के मोड से फिर नया ऊँचा रास्ता प्रारंभ हो जाता है।लौटकर आने वाले,"बस थोडी दूर और है" कहकर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते रहते हैं।मणिमहेश पहुंचने के लिये मुझे सबसे जरूरी लगा,दृढ़ इच्छाशक्ति का होना।सुंदरासी से थोडा पहले कुछ युवक अपने कंधों पर एक व्यक्ति के शव को ला रहे थे,जिसकी ऊपर ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु हो गयी थी।वहीं नीचे खाई में एक खच्चर का शव पडा था।इन घटनाओं ने मुझे झकझोर दिया व मन ही मन गौरीकुंड ही रुकने का निश्चय किया।
सुंदरासी के बाद एक भी कदम चलने की इच्छा नहीं हो रही थी किंतु मणिमहेश पर्वत के दर्शनों की उत्कंठा व ऊपर से पीछे की घाटी के मनोहर दृश्यों को नेत्रों से पीने की अतीव इच्छा,ऊपर बढ़ते रहने को प्रेरित कर रही थी।सुंदरासी में हमें 2:30 बज गये थे।सोनू जी खच्चर पर बैठ कर खच्चर वाले पर अपनी मारवाडी भाषा में अत्याचार करते हुए हमसे आगे निकल गये। गौरीकुंड के टेंट दिखाई दे रहे थे किंतु थकान के कारण ये 2 किमी की दूरी भी 20 किमी जैसी प्रतीत हो रही थी।धीरे धीरे घोंघे की तरह रेंगते हुए हम लगभग 4:30 पर गौरीकुंड पहुंच गये।
हम दोनों पहले ही गौरीकुंड रुकने का विचार कर चुके थे।एक ही दिन में 2200मीटर से 4200मीटर,लगभग 2000मीटर की ऊँचाई पर पहुंचने के कारण मुझे स्वयं में 'हाई ऐल्टीट्यूड मोशन सिकनैस' के लक्षण,सिर दर्द आदि महसूस हो रहे थे।तो अब और अधिक ऊँचाई पर चढ़ना मूर्खतापूर्ण फैसला ही होता।यहाँ हैलीपैड के निकट शेरसिंह जी के टेंट में 200₹ में रात गुजारने को स्थान मिल गया।टेंट में पहुंचते ही में डबल कंबलों में घुस गया।खाने का बिल्कुल मन नहीं था परन्तु शरीर को ऊर्जा भी जरूरी है।मैगी ऑर्डर की गयी,शेरसिंह जी द्वारा बनाई गयी मैगी का दिव्य स्वाद स्थायी स्मृति में संचित हो गया है।चौधरी साहब तो दो प्लेट उडा गये😊।
टेंट बिल्कुल मणिमहेश पर्वत के चरणों में था।मणिमहेश पर्वत का हिमाच्छादित किरीट नीचे ना गिर पडे इसीलिए उसे बच्चे की मानिंद बादलों की खिड़की में बन्द कर दिया गया था।कंबल में पडने के 1,2 घंटे बाद ही मुझे बुखार आ गया।रात को करीब 10 बजे अतुल भाईसाब ने शेरसिंह से पानी गर्म करवाया,जिससे दवा लेने के बाद 5कंबल ओढ कर सो गया।
रात को 1:30 बजे आँख खुल गयीं,दुबारा बुखार था।अब दवा लेने को पानी तो था नहीं सो टेंट के पीछे बहती हुई मणिमहेश गंगा द्वारा उत्पन्न संगीत को रात भर बुखार में पडा सुनता रहा।
क्रमश...
फव्वारा मार्ग स्थित झरना
हडसर की तरफ की पर्वत श्रेणी

गौरीकुंड से मणिमहेश पर्वत दर्शन

Comments

  1. छायाचित्र देखकर तो बड़ा ही रमणीय स्थान प्रतीत हो रहा है।

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    1. बिल्कुल,अत्यंत रमणीय।

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