बटेसरः खंडहरों का पुनर्जन्म
बटेसरः 200 मंदिरों की पुनर्जन्म कथा
पूर्व व सृजन के पश्चात
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नोरोपणानि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य
न्यानि संयाति नवानि देहि।।
(श्रीमद्भगवद्गीता)
(अर्थात जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नवीन वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार आत्मा पुराने व व्यर्थ शरीर को त्याग कर नवीन भौतिक देह धारण करती है।)
नवानि गृह्णाति नोरोपणानि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य
न्यानि संयाति नवानि देहि।।
(श्रीमद्भगवद्गीता)
(अर्थात जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नवीन वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार आत्मा पुराने व व्यर्थ शरीर को त्याग कर नवीन भौतिक देह धारण करती है।)
पुनर्जन्म सत्य है अथवा असत्य?
दिनांक 18/04/2019 को की गई एक यात्रा ने मेरे पुनर्जन्म संबंधी मत को प्रगाढ़ कर दिया।ये यात्रा थी मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में पढ़ावली गाँव के दक्षिण-पश्चिम में एक पहाड़ी की विस्तृत उपत्यका में स्थित बटेसर मंदिर समूह की।आप भले ही पुनर्जन्म संबंधी मान्यता से असहमत हों,बटेसर मंदिर समूह आपके मत को बदलने का माद्दा रखते हैं।जब आप यहाँ शिव मंदिर समूह के पुनर्जन्म का प्रत्यक्ष अवलोकन करेंगे तो संभवतः आप भी श्रीमद्भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक से एकमत हो जाएं।
बटेसर मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से परवर्ती गुप्त काल से गुर्जर-प्रतिहार काल के मध्य के हैं,जिसका काल 6वीं शताब्दी से 9वीं शताब्दी है।ये मंदिर खजुराहो से लगभग 300 वर्ष प्राचीन हैं।कालांतर में भूकंप आदि किसी प्राकृतिक आपदा के कारण ये मंदिर मलबे में परिवर्तित हो गये होंगे।प्रकृति सृजन व प्रलय दोनों ही कार्य समान रूप से अविरत करती रहती है।जिससे सृष्टि का संतुलन स्थिर बना रहता है।ऐसी ही किसी प्रलय से बटेसर के 200 मंदिर,जहाँ कभी घंटे-घड़ियालों व मंत्रों के उच्चारणों की ध्वनियाँ गूंजती होंगी,जमींदोज हो गये।
बटेसर मंदिरों के इस मलबे को वर्तमान स्वरूप प्रदान करने का प्रमुख श्रेय जाता है,पद्मश्री मुहम्मद के.के. को।इनके ही अथक प्रयासों व दृढ इच्छाशक्ति के बलबूते इस मनोरम स्थल का पुनर्सृजन संभव हुआ।यहां पुनर्निर्माण की अपेक्षा पुनर्सृजन कहना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि निर्माण व सृजन समानार्थक प्रतीत होते हुए भी भिन्न वस्तु हैं। निर्माण स्थूल एवं तात्कालिक होता है जबकि सृजन सूक्ष्म एवं दूरगामी भाव रखता है।सृजन मूल्यों की स्थापना करता है,उन्हें संरक्षित रखता है।
बटेसर का सृजन श्री मुहम्मद के.के. जी के लिए आसान कार्य नहीं था।विशेषतः उस क्षेत्र में जहाँ खनन माफिया के आगे सरकार पंगु हो एवं डकैतों की स्वघोषित सरकार ही वहाँ पुलिस,प्रशासन सब कुछ हो।के .के साहब की अद्वितीय सूझबूझ से ही इस सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण संभव हो सका।
सन् 2004-05 में आपने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में अधीक्षक के पद पर भोपाल में कार्यग्रहण किया।इसी समय मुहम्मद की निगाह बटेसर में फैली प्राचीन विरासत पर पड़ी।ये पत्थरों का ढेर भी मानो मुहम्मद साहब की प्रतीक्षा कर रहा था।किंतु उस समय इस क्षेत्र में डकैत निर्भय सिंह गुर्जर का आतंक था।बटेसर की पहाडियाँ निर्भय गुर्जर व उसकी गैंग की शरणगाह थीं व कहीं भी डकैती डालने से पहले यहाँ स्थित हनुमान जी की प्रतिमा की पूजा अवश्य करते थे।मुहम्मद साहब ने डकैत समूह से वार्ता करने का जोखिम उठाया एवं निर्भय गुर्जर को यह समझाने में सफल रहे कि ये खंडित मंदिर आपके पूर्वज गुर्जर-प्रतिहार राजाओं के हैं।ईश्वर ने इन मंदिरों की सुरक्षा का दायित्व आपको सोंपा है।यह सुनकर निर्भय गुर्जर ने स्वयं को अपने पूर्वजों से जुड़ा महसूस किया और इन मंदिरों के पुनर्सृजन में सुरक्षा व सहयोग का वचन दिया।किंतु 2007 में निर्भय गुर्जर पुलिस एन्काउन्टर में मारा गया।अब बटेसर की पहाडियों पर खनन माफिया की निगाह थी एवं खनन माफिया के समक्ष पुलिस व प्रशासन पंगु था। ऐसी परिस्थितियों में इस संदर्भ में मुहम्मद ने R.S.S प्रमुख श्री सुदर्शन जी को पत्र लिखा।
सुदर्शन जी ने 24घंटे के अंदर ही तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को पत्र लिखा।अब पुलिस व प्रशासन की कड़ी सख्ती से खनन माफिया कमजोर पड़ गया।
2005 से 2012 तक मात्र 3 करोड़ रुपयों में उद्यान,सुविधाओं व लगभग 80 मंदिरों का पुनर्सृजन किया जा चुका है।2012 में मुहम्मद साहब सेवानिवृत हो गये तब से सृजन कार्य बन्द पड़ा है। एक A.S.I के कर्मचारी ने मुझे बताया कि अभी बजट जारी हो गया है व निकट समय में कार्य पुनः प्रारंभ हो जायेगा।
इस गौरवशाली विरासत के पुनर्जन्म में तीन महत्त्वपूर्ण व्यक्ति पद्मश्री मुहम्मद केके,डकैत निर्भय गुर्जर व श्री सुदर्शन जी का अद्वितीय योगदान रहा है।
मैं विष्णु मंदिर(निर्भय गुर्जर मंदिर) में खड़ा सामने उत्खनित पहाड़ियों को देख सोचता हूं, यहाँ डकैत ना होते तो ये मंदिर व शेष भग्नावशेष 'गढ़ी पढ़ावली' के समान किन्ही मकानों की दीवारों में चुन गये होते या शायद इंग्लैंड पहुंच गये होते।चंबल क्षेत्र डकैतों द्वारा की गई हजारों हत्याओं व लूटपाटों का साक्षी रहा है तथापि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत डकैतों के भय से सुरक्षित ही रही है।
के.के साब रिटायर्ड हो चुके हैं और आज भी बटेसर में असंख्य भग्नावशेष,प्रतिमाएं,शिवलिंग अपना यथोचित स्थान ग्रहण करने हेतु प्रतीक्षारत हैं।अब कोई और नया मुहम्मद के.के आयेगा जो पत्थरों पर लिखे इतिहास को पढ़ेगा और समझेगा,पत्थरों की जुबान को।फिर से घंटे-घडियालों व मंत्रों के उच्चारण की ध्वनियों से गूंज उठेगी बटेसर घाटी।खनन माफिया के बारूदी धमाकों की कर्कश ध्वनियाँ निश्चय ही मंदिरों की घंटियों की ध्वनियों से हार जायेंगी। अगले वर्ष फिर आऊँगा,भूतेश्वर महादेव से बतियाने।शायद तब तक पत्थरों के मलबे में पड़े शिवलिंग गर्भगृह में विराजमान हो जायेंगे।अवश्य ही आऊंगा।आप भी आईयेगा,निराश नहीं होंगे।
जय जय।
"ए समय की धार,जिसमें सब बह जाया करते हैं और।
जो पत्थर रुक जाया करते हैं,वो इतिहास बनाया करते हैं।"
(पद्मश्री मुहम्मद के.के.)
दिनांक 18/04/2019 को की गई एक यात्रा ने मेरे पुनर्जन्म संबंधी मत को प्रगाढ़ कर दिया।ये यात्रा थी मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में पढ़ावली गाँव के दक्षिण-पश्चिम में एक पहाड़ी की विस्तृत उपत्यका में स्थित बटेसर मंदिर समूह की।आप भले ही पुनर्जन्म संबंधी मान्यता से असहमत हों,बटेसर मंदिर समूह आपके मत को बदलने का माद्दा रखते हैं।जब आप यहाँ शिव मंदिर समूह के पुनर्जन्म का प्रत्यक्ष अवलोकन करेंगे तो संभवतः आप भी श्रीमद्भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक से एकमत हो जाएं।
बटेसर मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से परवर्ती गुप्त काल से गुर्जर-प्रतिहार काल के मध्य के हैं,जिसका काल 6वीं शताब्दी से 9वीं शताब्दी है।ये मंदिर खजुराहो से लगभग 300 वर्ष प्राचीन हैं।कालांतर में भूकंप आदि किसी प्राकृतिक आपदा के कारण ये मंदिर मलबे में परिवर्तित हो गये होंगे।प्रकृति सृजन व प्रलय दोनों ही कार्य समान रूप से अविरत करती रहती है।जिससे सृष्टि का संतुलन स्थिर बना रहता है।ऐसी ही किसी प्रलय से बटेसर के 200 मंदिर,जहाँ कभी घंटे-घड़ियालों व मंत्रों के उच्चारणों की ध्वनियाँ गूंजती होंगी,जमींदोज हो गये।
बटेसर मंदिरों के इस मलबे को वर्तमान स्वरूप प्रदान करने का प्रमुख श्रेय जाता है,पद्मश्री मुहम्मद के.के. को।इनके ही अथक प्रयासों व दृढ इच्छाशक्ति के बलबूते इस मनोरम स्थल का पुनर्सृजन संभव हुआ।यहां पुनर्निर्माण की अपेक्षा पुनर्सृजन कहना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि निर्माण व सृजन समानार्थक प्रतीत होते हुए भी भिन्न वस्तु हैं। निर्माण स्थूल एवं तात्कालिक होता है जबकि सृजन सूक्ष्म एवं दूरगामी भाव रखता है।सृजन मूल्यों की स्थापना करता है,उन्हें संरक्षित रखता है।
बटेसर का सृजन श्री मुहम्मद के.के. जी के लिए आसान कार्य नहीं था।विशेषतः उस क्षेत्र में जहाँ खनन माफिया के आगे सरकार पंगु हो एवं डकैतों की स्वघोषित सरकार ही वहाँ पुलिस,प्रशासन सब कुछ हो।के .के साहब की अद्वितीय सूझबूझ से ही इस सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण संभव हो सका।
सन् 2004-05 में आपने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में अधीक्षक के पद पर भोपाल में कार्यग्रहण किया।इसी समय मुहम्मद की निगाह बटेसर में फैली प्राचीन विरासत पर पड़ी।ये पत्थरों का ढेर भी मानो मुहम्मद साहब की प्रतीक्षा कर रहा था।किंतु उस समय इस क्षेत्र में डकैत निर्भय सिंह गुर्जर का आतंक था।बटेसर की पहाडियाँ निर्भय गुर्जर व उसकी गैंग की शरणगाह थीं व कहीं भी डकैती डालने से पहले यहाँ स्थित हनुमान जी की प्रतिमा की पूजा अवश्य करते थे।मुहम्मद साहब ने डकैत समूह से वार्ता करने का जोखिम उठाया एवं निर्भय गुर्जर को यह समझाने में सफल रहे कि ये खंडित मंदिर आपके पूर्वज गुर्जर-प्रतिहार राजाओं के हैं।ईश्वर ने इन मंदिरों की सुरक्षा का दायित्व आपको सोंपा है।यह सुनकर निर्भय गुर्जर ने स्वयं को अपने पूर्वजों से जुड़ा महसूस किया और इन मंदिरों के पुनर्सृजन में सुरक्षा व सहयोग का वचन दिया।किंतु 2007 में निर्भय गुर्जर पुलिस एन्काउन्टर में मारा गया।अब बटेसर की पहाडियों पर खनन माफिया की निगाह थी एवं खनन माफिया के समक्ष पुलिस व प्रशासन पंगु था। ऐसी परिस्थितियों में इस संदर्भ में मुहम्मद ने R.S.S प्रमुख श्री सुदर्शन जी को पत्र लिखा।
सुदर्शन जी ने 24घंटे के अंदर ही तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को पत्र लिखा।अब पुलिस व प्रशासन की कड़ी सख्ती से खनन माफिया कमजोर पड़ गया।
2005 से 2012 तक मात्र 3 करोड़ रुपयों में उद्यान,सुविधाओं व लगभग 80 मंदिरों का पुनर्सृजन किया जा चुका है।2012 में मुहम्मद साहब सेवानिवृत हो गये तब से सृजन कार्य बन्द पड़ा है। एक A.S.I के कर्मचारी ने मुझे बताया कि अभी बजट जारी हो गया है व निकट समय में कार्य पुनः प्रारंभ हो जायेगा।
इस गौरवशाली विरासत के पुनर्जन्म में तीन महत्त्वपूर्ण व्यक्ति पद्मश्री मुहम्मद केके,डकैत निर्भय गुर्जर व श्री सुदर्शन जी का अद्वितीय योगदान रहा है।
मैं विष्णु मंदिर(निर्भय गुर्जर मंदिर) में खड़ा सामने उत्खनित पहाड़ियों को देख सोचता हूं, यहाँ डकैत ना होते तो ये मंदिर व शेष भग्नावशेष 'गढ़ी पढ़ावली' के समान किन्ही मकानों की दीवारों में चुन गये होते या शायद इंग्लैंड पहुंच गये होते।चंबल क्षेत्र डकैतों द्वारा की गई हजारों हत्याओं व लूटपाटों का साक्षी रहा है तथापि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत डकैतों के भय से सुरक्षित ही रही है।
के.के साब रिटायर्ड हो चुके हैं और आज भी बटेसर में असंख्य भग्नावशेष,प्रतिमाएं,शिवलिंग अपना यथोचित स्थान ग्रहण करने हेतु प्रतीक्षारत हैं।अब कोई और नया मुहम्मद के.के आयेगा जो पत्थरों पर लिखे इतिहास को पढ़ेगा और समझेगा,पत्थरों की जुबान को।फिर से घंटे-घडियालों व मंत्रों के उच्चारण की ध्वनियों से गूंज उठेगी बटेसर घाटी।खनन माफिया के बारूदी धमाकों की कर्कश ध्वनियाँ निश्चय ही मंदिरों की घंटियों की ध्वनियों से हार जायेंगी। अगले वर्ष फिर आऊँगा,भूतेश्वर महादेव से बतियाने।शायद तब तक पत्थरों के मलबे में पड़े शिवलिंग गर्भगृह में विराजमान हो जायेंगे।अवश्य ही आऊंगा।आप भी आईयेगा,निराश नहीं होंगे।
जय जय।
"ए समय की धार,जिसमें सब बह जाया करते हैं और।
जो पत्थर रुक जाया करते हैं,वो इतिहास बनाया करते हैं।"
(पद्मश्री मुहम्मद के.के.)






बहुत़ ही बेहतरीन पोस्ट लेखन कला भाई जी। जय़ महादेव
ReplyDeleteहर हर महादेव सुनील जी
ReplyDeleteAti uttam bhai
ReplyDeleteआभार भाई जी।
Deleteबहुत अच्छे गुरूजी
ReplyDeleteआभार।
Deleteबहुत अच्छे गुरूजी
ReplyDeleteआभार
DeleteAdbhut lekhani he sir apki
ReplyDeleteआपका आभार महोदय
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